Sunday, November 20, 2011

मेरे सपने





मैं हूं एक छोटी सी गुडिया
मेरे सपने भारी,
अभी अभी आयी हूं जग में
खुशियां चाहूं सारी.
मैं सपनों को जगा रही हूं
सोये हैं जो मन में बंद,
पहले किसको पहचानूं
सवाल कठिन,मन में है द्वन्द.
मम्मी की आवाज़ सुनूं या
पापा के मन मे झांकू,
नाना को कोने से देखूं ,या
नानी को सीधे ताकूं.
दादा दादी बुला रहे हैं
लेने को मेरी चुम्मी,
मन करता है टिकट कटाकर
चली जाऊं घुम्मी-घुम्मी.
मामा को मैं जीभ दिखाऊं
चलाऊ पैर की सायकिल,
दोनों हाथ उठाकर जीतूं
मैं अपनें अपनों का दिल.

7 comments:

  1. बचपन की याद दिलादी आपने बहुत ही सुंदर रचना बधाई

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  2. बहुत ही प्यारी बाल कविता ....सुंदर रचना

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  3. प्रिय कुश्वंश जी मन खुश हो गया ..लगा छोटा सा मै भी लेटा हाथ पैर चला रहा हूँ ...बधाई हो

    भ्रमर ५
    बाल झरोखा सत्यम की दुनिया

    नाना को कोने से देखूं ,या
    नानी को सीधे ताकूं.
    दादा दादी बुला रहे हैं
    लेने को मेरी चुम्मी,
    मन करता है टिकट कटाकर
    चली जाऊं घुम्मी-घुम्मी.

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  4. सुन्दर बाल कविताएँ

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  5. वाह, यह तो बहुत प्यारी कविता है. अच्छा लगा यहाँ आकर. 'पाखी की दुनिया' में भी आइयेगा.

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  6. बहुत प्यारी कविता है.

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