बच्चों का आकाश
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Tuesday, December 13, 2011

गुडिया अलबेली



यहाँ वहां तितली बन उडती
मै गुडिया अलबेली,
परियों के संग आना जाना
मैं अनजान पहेली,
जिस घर में पाती हूँ प्यार
मैं उसको अपनाऊ,
वर्ना टाटा बाय बाय कर
कभी पास ना आऊँ,
मै इतनी सुन्दर दिखती  हूँ
चंदा  भी शर्माए,
मेरे सामने विस्वसुन्दरी
पानी भरने आये,
जो भी देखो गाल नोचता
अपना  प्यार दिखता ,
मैं हंसती हूँ ऊपर ऊपर
अन्दर गुस्सा आता,
गोद मुझे मम्मी की भाये
पापा की बाहों का झूला,
पूरे घर की सैर करू तो
खाना पीना भूला,
दादी कहती सोजा बेटी
दादा कहते आजा,
भैया चिकोटी काट के कहता
और बजाओ बाजा.
मै कहती नानी घर जाऊ
नानी कहे कहानी,
नाना कहते मुझे दिखाओ
कहाँ है रोती रानी.


   





Sunday, November 20, 2011

मेरे सपने





मैं हूं एक छोटी सी गुडिया
मेरे सपने भारी,
अभी अभी आयी हूं जग में
खुशियां चाहूं सारी.
मैं सपनों को जगा रही हूं
सोये हैं जो मन में बंद,
पहले किसको पहचानूं
सवाल कठिन,मन में है द्वन्द.
मम्मी की आवाज़ सुनूं या
पापा के मन मे झांकू,
नाना को कोने से देखूं ,या
नानी को सीधे ताकूं.
दादा दादी बुला रहे हैं
लेने को मेरी चुम्मी,
मन करता है टिकट कटाकर
चली जाऊं घुम्मी-घुम्मी.
मामा को मैं जीभ दिखाऊं
चलाऊ पैर की सायकिल,
दोनों हाथ उठाकर जीतूं
मैं अपनें अपनों का दिल.